Bhaktamar Stotra (भक्तामर स्तोत्र) PDF – Prem Singh Rathod

 स्व. जैन दिवाकर प्रसिद्ध वक्ता श्री चौथमलजी म. सा. के प्रवचनों के आदि में भक्तामर स्तोत्र के श्लोकों का विवेचन रहा करता था उस विवेचन को डाक्टर प्रेमसिंहजी ने सुन्दर ढग से संकलित और सम्पादित किया है । श्री दिवाकर दिव्य ज्योति कार्यालय की ओर से इसका प्रकाशन किया जा रहा है। माननीय डाक्टर साहब ने इस रूप में जो निस्वार्थ सेवा की है वह सराहनीय है डाक्टर साहब ने इस सम्पादन द्वारा स्व जन दिवाकरजी के प्रति अपनी श्रद्धा और साहित्य अभिरूचि प्रकट की है इसके लिए हम उनके आभारी है।

इस पुस्तक के लेखक श्री रामनन्दन मिश्र जी है। यह पुस्तक हिंदी भाषा में लिखित है। इस पुस्तक का कुल भार 5 MB है एवं कुल पृष्ठों की संख्या 198 है। निचे दिए हुए डाउनलोड बटन द्वारा आप इस पुस्तक को डाउनलोड कर सकते है।  पुस्तकें हमारी सच्ची मित्र होती है। यह हमारा ज्ञान बढ़ाने के साथ साथ जीवन में आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करती है। हमारे वेबसाइट JaiHindi पर आपको मुफ्त में अनेको पुस्तके मिल जाएँगी। आप उन्हें मुफ्त में पढ़े और अपना ज्ञान बढ़ाये।

Writer (लेखक ) प्रेमसिंह राठौड़
Book Language ( पुस्तक की भाषा ) Hindi | हिंदी
Book Size (पुस्तक का साइज़ )
5 MB
Total Pages (कुल पृष्ठ) 198
Book Category (पुस्तक श्रेणी) Religious / धार्मिक

पुस्तक का एक अंश

 परम पूज्य जैन दिवाकर चौथमलजी महाराज साहब एक महान् आत्मा थे, जिसने अपनी ओजस्वी, सरल, सर्व ग्राह्य, सुबोध वाणी द्वारा अहिंसा का अभूतपूर्व प्रचार किया । आपकी व्याख्यान शैली और बोलने की कला अपने ढंग की निराली ही थी । गहन से गहन विषय को भी सुगमता से जन-जन के मन में जमा देने की उनमें अद्भुत शक्ति थी। उनके उपदेशों से प्रभावित होकर राणा महाराणा, राजा-महाराजाओं और जागीरदारों ने “अगले पालने के आदेश निकाने और मूक पशुओं की रक्षा करके उन्हें अभयदान दिया । पूज्य दिवाकरजी का प्रभाव राज. महलों से लगाकर गरीबों की झोपड़ियों और भीलों की टापरियों तक था। बिना किसी भेद भाव के सभी वर्ग वर्ण और जाति के लोग तथा अमीर और गरीब, आपके प्रवचनों को साथ-साथ बैठकर सुनते थे और जीवन-सुधार के राज मार्ग पर चलते हुए तपश्चर्या में होड़ लगाते थे । हरिजन उद्धार के उनके भागीरथ प्रयत्नों का ही फल था कि हजारों व्यक्तियों ने हिंसक धन्धों को त्याग कर अहिंसा का मार्ग अपनाया । समाज के दलित, पतित और पिछड़े वर्गों के लोगों की आप पर अपार और अटूट श्रद्धा थी।

जैन-दिवाकरजी जैन-एकता के प्रबल-समर्थक थे। कोटा के उनके महत्वपूर्ण कार्य को कैसे भुलाया जा सकता है ? उन्हीं की सद् प्रेरणा से पूज्य आचार्य श्री आनन्द सागरजी तथा पूज्य दिगम्बर सन्त श्री सूर्य सागरजी महाराज साहब व दिवाकरजी ने मिलकर एक ही मंच पर सामूहिक प्रवचन दिये । जैन दिवाकरजी ने समन्वय का जो पाठ पढ़ाया वह उनकी अंतिम और अनुपम भेंट थी ।

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