Mera Parivar (मेरा परिवार) PDF – Shyamu Sanyasi

मेरा परिवार श्यामू संन्यासी के द्वारा अनुवादित पुस्तक है। इस पुस्तक की लेखिका, श्रीमती नटालिया अलेक्जेन्द्रोबना फ्लोमर, एक ऐसी सोवियत महिला हैं, जिनके जिनकी अपनी कोई संतान नहीं हो पाती। इसलिए वह बच्चों को गोद लेती हैं। उनका मातृत्व इतना प्रतल है कि केबल एक या दो बच्चों को गोद ले लेने से उनका मन नहीं मरता | वह एक के बाद एक, पूरे पांच बच्चे गोद लेतीं और उन सत्रका अपनी पेट को संतान की ही तरह पालन-पोषण करती हैं। पांच बच्चों के बाद बुढ़ापे में वह एक छठ्तें बच्चे के लालन-पालन का भार भी अपने ऊपर लेती हैं ।

यह पुस्तक हिंदी भाषा में अनुवादित है। इस पुस्तक का कुल भार 26 MB है एवं कुल पृष्ठों की संख्या 286 है। निचे दिए हुए डाउनलोड बटन द्वारा आप इस पुस्तक को डाउनलोड कर सकते है।  पुस्तकें हमारी सच्ची मित्र होती है। यह हमारा ज्ञान बढ़ाने के साथ साथ जीवन में आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करती है। हमारे वेबसाइट JaiHindi पर आपको मुफ्त में अनेको पुस्तके मिल जाएँगी। आप उन्हें मुफ्त में पढ़े और अपना ज्ञान बढ़ाये।

Translator ( अनुवादक ) श्यामू संन्यासी
Book Language ( पुस्तक की भाषा ) Hindi | हिंदी
Book Size (पुस्तक का साइज़ )
26 MB
Total Pages (कुल पृष्ठ) 286
Book Category (पुस्तक श्रेणी) Novels / उपन्यास

पुस्तक का एक मशीनी अनुवादित अंश

आया स्ट्री: वाले उस छोटें-से मकान में काफ़ी भीड़-भाड़ थी । बच्चों का कमरा (नमरी) अन्घेरा था । उसमें तीन बिस्तरे झोर एक बड़ी सनन्‍्दूक घरी थी । वह सन्दृक आया के सोने के काम झाती थी | तीन बिस्तरों में से एक बिस्तर उस पीली ओर धुन्ती बालिका का था, जिसका नाम में बिलकुल ही सूल गई हूँ | इससमय सिर्फ इतना याद है कि उस बालिका का पिता एक व्यापारी था | उसका नाम गेरेलिन था; और घर के बढ़े-बूढ़े सदेव ही बड़ी घृणा ओर तुच्छुतापूवषक उसके नाम का उल्लेख
कप कह करते थे।

बाकी के दोनों बिस्तरों में से एक मेरा और दूसरा मिशा का था । उससमय भी में इतना जानती थी कि मिशा मेरा बड़ा भाई है । में मिशा को प्यार करती थीं, परन्तु साथ ही उससे थोड़ा डरती भी थी । मिशा मेरे प्रति व्यवहार में लापवहि-सा था; लेकिन जब कभी गोरेजिन की बेटी अन्धेरे गलियारे में मेरे चिकोटियाँ काटने लगती तो बह तुरन्त मुझे छुड्टाने भाजाता था ।

धारा मकान घुटा-घुटा-सा था | उसमें उजेले का नांमतक नहीं था । स्‍्वये हमारा भपना कमरा भी काफी भन्वेरा था भोर उसमें एक भी खिड़की नहीं थी । उसे ‘नसेरी’ कहना भी ज्यादती ही थी । न उसमें खिलौने थे ओर न हम बालकों के मन को लुभाने और खुश करने वाली दूसरी कोई चौज़ ही थी । भोर तो और, बालकों के कमरों में भामतौर से पात्रे जा वाले चीनी मिं्री के टटेफूटे खिलौने ना भाल, कपड़ों की गुड़िय लड्डी के गे, रत-मौदर आदि कुछ भी नहीं था | |

डिस्क्लेमर – यह अंश मशीनी टाइपिंग है, इसमें त्रुटियाँ संभव हैं।

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