Sociology | समाजशास्त्र

प्रस्तुत पुस्तक में भारतीय समाज और भारतीय समाज में परिवर्तन और विकास का समाजशास्त्रीय विवेचन किया गया है। यह पुस्तक पाठकों को भारतीय समाज को निकट से समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य के अनुसार परिचित करवाने का अवसर प्रदान करती है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए पुस्तक को दो खण्डों में विभाजित किया गया है। प्रथम खण्ड भारतीय समाज, संस्कृति, विवाह, परिवार, नगरीय एवं जनजातीय समुदाय तथा भारतीय नारी की सामाजिक प्रस्थिति से परिचित कराता है। साथ ही भारतीय सम्पज को अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़े वर्गों की समस्याओं से भी अवगत कराती है।

दितीय खण्ड भारतीय समाज के परिवर्तन और विकास की ओर भी सभी का ध्यान आकृष्ट करता है। यह राण्ड पाठकों को भारतीय सामाजिक-धार्मिक और राष्ट्रीय आन्दोलनों के समाजशास्त्रीय-सप्रत्ययो से अवगत कराता है। इस खण्ड में स्वातन्त्र्योत्तर भारत के विकास को सम्भावनाओ जैसे पचायती राज, पंचवर्षीय योजनाएं, एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम आदि की सविस्तार विवेचना की गई है, जिससे पातक भारत में हो रहे विकास कार्यों का सही आकलन कर सके । अपने अधिकारों और कर्तव्यों की जानकारी हेतु विवाह, परिवार और जाति से सम्बन्धित विधानो का भी यथास्थान वर्णन किया गया है।

Writer (लेखक ) वीरेन्द्र प्रकाश शर्मा
Book Language ( पुस्तक की भाषा ) हिंदी
Book Size (पुस्तक का साइज़ )
9 MB
Total Pages (कुल पृष्ठ)
391
Book Category (पुस्तक श्रेणी) Educational / शिक्षात्मक 

पुस्तक का एक मशीनी अनुवादित अंश

भारतीय समाज में विभिन्नता भारतीय समाज और उसकी सस्कृति विश्व की सम्कृतियों में अपना अक्षुषमा स्थान बनाए हुए है, इसका प्रमुख कारण इसकी सांस्कृतिक परम्परा कही जा सकती है। धर्म, कर्म, जातीयता, वर्णव्यवस्था, सहिष्णुता, आनुकूल्यन की विशेषता, आध्यात्मिकता व ग्रहणशीलता आदि अनेक विशेषताओं के कारण यह समाज विदेशी व बाह्य सस्कृतियो का आकर्षण का केन्द्र शर। सयुक्त परिवार, जातिगत मूल्य कर्म और धर्म की प्रधानता आज भी हमारा मार्गदर्शन कर रही है।

आत्मसात् और सात्मीकरण की विशेषता के कारण ही हिन्दू और मुसलमान साथ-साथ रहते है। आज हिन्दु, मुसलमान, सिख, बौद्ध, जैन और ईसाई आदि घों के अनुयायी भारत की सवैधानिक व्यवस्था, शासनतंत्र और अन्य सार्वजनिक जीवन में महभागिता के साथ जीवन-यापन कर रहे है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि इन विशेषताओ के परिणामम्बरूप ही भारतीय समाज और संस्कृति में निरन्तर एकता पाई जाती है। 

यदि किसी समाज के कुछ सदस्यों के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक हितों की अभिव्यक्ति और उसका संरक्षण होता हो तो उसे भी संजातीयता के अन्तर्गत लिया जा सकता है। उसी भाँति जब कोई समूहसमाज में किसी विशिष्ट स्थिति और मान्यता को प्राप्त करने का प्रयास करतातो उसे संजातीय-चेतना के नाम से अभिहित किया जा सकता है। एक संजातीय समूह की अपनी एक संस्कृति होती है अत संजातीयता को एक सांस्कृतिक-तघ्य के रूप में भी लिया जा सकता है इससे यह आई भी निकलता है कि संजातीयता एक सांस्कृतिक समूह भी है।

डिस्क्लेमर – यह अंश मशीनी टाइपिंग है, इसमें त्रुटियाँ संभव हैं। 

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