Mere Bhai Balraj | मेरे भाई बलराज PDF

मेरे भाई बलराज, भीष्म साहनी राजवाड़े के द्वारा लिखी गयी एक साहित्यिक पुस्तके पुस्तक है। यह पुस्तक हिंदी भाषा में लिखित है। इस पुस्तक में लेखक भीष्म साहनी ने अपने बड़े भाई के बारे में बताया है। इस पुस्तक का कुल भार 3.55 MB है एवं कुल पृष्ठों की संख्या 170 है। नीचे दिए हुए डाउनलोड बटन द्वारा आप इस पुस्तक को डाउनलोड कर सकते है।  पुस्तकें हमारी सच्ची मित्र होती है। यह हमारा ज्ञान बढ़ाने के साथ साथ जीवन में आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करती है। हमारे वेबसाइट JaiHindi पर आपको मुफ्त में अनेको पुस्तके मिल जाएँगी। आप उन्हें मुफ्त में पढ़े और अपना ज्ञान बढ़ाये।

Writer (लेखक ) भीष्म साहनी
Book Language ( पुस्तक की भाषा ) हिंदी 
Book Size (पुस्तक का साइज़ )
3.55 MB
Total Pages (कुल पृष्ठ)
170
Book Category (पुस्तक श्रेणी) Literature / साहित्य

पुस्तक का एक मशीनी अनुवादित अंश

बलराज का बचपन जिम परिवेश और जिस घर में बीता, वह भी अपनी तरह का था। पिता जी, व्यापार तो करते थे पर न तो उनकी कोई दुकान थी, न ही बाकायदा दफ्तर था। अपने घर के अंदर ही, निचली मजिल पर, उन्होंने एक कमरे को अपना दफ्तर बना रखा था, और वही से वह अपना सारा व्यापार चलाते थे। कुछेक फ़ाइलें, एक पुराना टाइपराइटर, एक मैच, दो-चार कुतियां, बस, यही उनका व्यापार-कार्यालय था। हफ्ते में एक बार बहुपा बृहस्पतिवार के दिन, वह टाइपराइटर के सामने बैठ जाने थे और एक अंगुली से टाईप करते हुए अपनी विलायती डाक टाईप किया करते थे।

उन्होने टाईप करना सीखा ही नहीं था। पर मे उस दिन को ‘विलायती डाक का दिन’ कहा जाता था, उस दिन हम बच्चों को उनके दफ्तर में अदर जाने की मनाही थी, और हम गुप-चुप, दबे पांव एक कमरे से दूसरे कमरे में पूमते रहते । वृहस्पतिवार की शाम को ही विलायती डाक डाकघर में डाली जाती थी। उसी दिन सुबह को पिता जी अपनी दाक लिखने बैठते थे। यह आज भी मेरे लिए एक रहस्य बना हुआ है कि पिता जी अपनी डाक सप्ताह के अन्य दिनों में क्यों नहीं लिखते थे। उस दिन सारा परिवार दम साधे बैठा रहता था। और पिता जी, चिट्ठियां टाईप करने में घटों लगा देते थे, और इसका नतीजा यह होता था कि डाक अक्सर रेलवे स्टेशन पर डाली जाती थी।

पर का एकमात्र नौकर, तुलसी, भागता हुआ, या तो नगर के बड़े टाकसाने में, या फिर रेलवे स्टेशन पर चिट्ठियां डालने जाता था। वक्त की पाबंदी, पवस्या नियमितता, ऐसे गुण, जो अक्सर आयात-व्यापारियों में पाये जाते है, पिता जी में, दूंढने को भी नहीं मिलते थे। बृहस्पतिवार की शाक से निवर पुकने के बाद, पिता जी फिर से अपनी सामान्य दिनचर्या मे नौट माते पं.मुबह को सम्बी सैर, दिन के वक्त योड़ा अध्ययन, पोदा आराम, और बायसमाज और उसकी विभिन्न संस्थाओं की सरगर्मियों में सहयोग । व्यापार गोग हो जाता और भार्यसमाज के काम, जिनमें यह बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे प्राथमिकता ग्रहण कर लेते। * पिता जी इन्टेक्ट का पापार करते थे।

डिस्क्लेमर – यह अंश मशीनी टाइपिंग है, इसमें त्रुटियाँ संभव हैं। 

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