Tarun Bharat (तरुण भारत) PDF – Ramchandra Verma

तरुण भारत – ऐतिहासिक काल में सबसे बड़ा और मद्दोत्मा सम्राट था। उसके समय में समस्त भारतवर्ष एक छत्न के अधीन हो गया था। वह बल के अपेक्षा प्रेम से शासन करता था। यहाँ तक कि वद्द जीव जंतुओं से भी प्रेम करता था। यह भी फहा है! है कि उसने पशुश्रों तक की चिकित्सा के लिए. चिकित्सालय ख़ुलवाये थे। ये सब बातें ईसामसीह के जन्म से पूर्च ही हुई थीं। ईंखी सन्‌ से तीच सो छुष्बीस वर्ष पहले से लेकर आठवीं शताब्दी के मध्य तक भारतवर्ष पर फभी विदेशी शासक का अधिकार नही हुआ; अथवा या कहिए कि इस समय तक किसी दूसरे देश के हाथ में उसका शासनाधिकार नहीं गया था।

हाँ, कभी कभी मध्य एशिया से कुछ खानावदोशी जातियाँ भारत में घुल आती थी, पर वे भी श्रन्त में इस देश के छुक्शाली आय्यों में मिल जुल्ल कर लुप्त हो हो जाती थीं। भारतवर्ष पर जो दूसरा बाहरी आक्रमण हुआ और भांस तीय इतिहाव तथा संजांश्रो पर जिसका खायी प्रभाव पड़ा, और जिसके साथ द्वी साथ भारतीय इतिहास में एक बिलकुल नये युग का संचार हुआ था वह आठवीं शताब्दी के मध्य में अचुलकासिम का था। पूरे चार सौ वर्ष तक मुसलमान लोग भारत के द्रवाज़ें पर टकराते रहे, पर घे देश में अपना राज्य शापित न कर सके ।

Writer (लेखक ) रामचन्द्र वर्मा
Book Language ( पुस्तक की भाषा ) Hindi | हिंदी
Book Size (पुस्तक का साइज़ )
5 MB
Total Pages (कुल पृष्ठ)
178
Book Category (पुस्तक श्रेणी) India / भारत 

पुस्तक का एक अंश

भारतवर्ष में मुसलमानी राज्य छः शताब्दियों तक मिन्न सिध्ष दशा में रदा। तीन शताब्दियों तक अथवा तेरहवीं शताब्दी से ले कर सोलह॒वों शताब्दी के आरंभ तक चह चस्तुतः उत्तरीय भारत तक ही परिमित रहा । दतक्तिण, राज- पूताना और मध्यभारत अकबर से पहले कभी पूर्णतः मुख- लमानों के अधिकार में नहीं गया था। वद्द खदा थोड़ा बहुत स्वतंत्र रहा । पर अकबर भी उदयपुर के अजय्य राणा प्रताप पर घिजय पाने में असमर्थ रहा | राणा प्रताप द्वार गये, अपनी राजधानी से निकाल दिये गए, उनका पीछा किया गया। तात्पय॑ यह है कि उन्होंने अनेक प्रकार के कष्ट सहे पर उन्होंने कभी मुगल साप्नाज्य के आगे सिर न झुकाया ।

अकबर ने प्रायः सभी राजपूत राजाओं को अपने अधिकार में कर लिया था| किसी को भुजबल से और किली को मिन्न भाव से उसने अपनी श्रोर मिल्रा लिया था। किस्तु शिसोदिया राज ने कभी भी उसके भआगे घुदने न टेके । उसके देशवासो झंदय से’ उसका पूजन करते थे । हिन्दुओं में उस समय भी जन्मभूमि और स्वतंत्रता के प्रति इतना अग्राघ प्रेम था कि जब एक थार अकबर ने अपने दरवार में इस वात को घोषणा की कि प्रताप ने अधीनता स्वीकार करने की प्रार्थना की है तब राजपूत दरबारियों को उसकी बांत पर विश्वास ही न हुआ | यह बात सभी लोग जानते हैं. कि उन द्रवारियों में से पृथ्वीराज नामक एक्र कवि ने प्रताप को लिणा था कि इस समाचार ने मेरे हृदय में अऋथनोय खेद उत्पन्न कर दिया है।

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