Valmiki Ramayan Aur Ramcharitmanas | वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस

वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस भारतीय साहित्य के दो बहुमूल्य रत्न हैं। दोनो के रचना काल मे महनाधिक वर्षों का व्यवधान है तथापि आदि कवि ने जिस भव्य काव्य-परम्परा का श्रीगणेश किया ‘उसे मानसलार ने एक नूतन उत्कर्ष प्रदान किया है। मानस के कवि ने पूर्ववर्ती साहित्य या आभार स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया है और वाल्मीकि के प्रति विशेष रूप से सम्मान व्यक्त किया है इसके साथ ही रामचरितमानस में पूर्व परम्परा मे उमकी भिन्नता की ओर भी स्पष्ट संकेत मिलता है। रामचरितमानस को पूर्ववर्ती रामकाव्य-परम्परा के परिप्रेक्ष्य में रख पर देखने से यह बात स्पष्ट हो जाती है।

रामचरितमानस का कवि वाल्मीकि रामायण के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील रहा है। मानस की क्या-विवृति, चरित्र प्रस्तुति, साबेगिक उद्दीप्ति मौर शिल्प विधि में उसके प्रध्यता को कभी सादृश्य-रूप मे तो कभी प्रतिश्यिा स्प मे वाल्मीकि रामायण की झलक व्यापक रूप से मिलती है-कही यह वाल्मीकि की पनुसृष्टि प्रतीत होती है तो कही प्रतिसृष्टि, फिर भी समग्रत उसको छाप रामायण से बहुत भिन्न और स्वतत्र रूप मे प्रक्ति होती है।

रामायण के प्रति रामचरितमानस के कवि की इस सवेदनशीलता, साथ ही स्वतत्र काव्य सर्जना को देखते हुए दोनो काव्यों का तुलनात्मक अध्ययन अपरिहार्य हो जाता है। यह तुलना एक ओर प्रसग-ग्रहण, भाव-ग्रहण, पाद-ग्रहण आदि के रूप में काव्य के ऊपरी स्तर पर हो सकती है तो दूसरी ओर काव्य-सृष्टि के अन्तर में पैठकर कवियो के रचना-कौशल की तुलना से उनको सौन्दर्य-विधान-प्रक्रिया और उनके काव्यों की प्रभाव-बाकि के स्रोतो की अन्वेषणा की जा सकती है। काव्य-सौंदर्य के सम्यक् मूल्याङ्कन के लिये द्वितीय प्रकार की तुलना ही अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती है और इसी दृष्टि से मैंने प्रस्तुत पोष-कार्य किया है।

Writer (लेखक ) डॉ जगदीश शर्मा
Book Language ( पुस्तक की भाषा ) हिंदी
Book Size (पुस्तक का साइज़ )
6.85 MB
Total Pages (कुल पृष्ठ) 389
Book Category (पुस्तक श्रेणी) Mythological / पौराणिक

पुस्तक का एक मशीनी अनुवादित अंश

ध्वनि सिद्धान्त में काव्य सौन्दर्य के सहृदय सक्रमण का विचार यही गहराई से किया गया है । काव्य-मौन्दर्ग का माध्यम दाद-वनि है जो श्रवणेन्द्रिय से ग्रहण की जाती है। इसलिये सर्वप्रथम यह प्रश्न उठता है कि श्रवणेन्दिय के माध्यम से गृहीत दाम्द ध्वनि से पर्ग बोध कसे हाता है। इस समस्या का बहुत ही समीचीन समापान स्फोट सिद्वान ने दिया है। इस सिद्धांत का मापार मनोज्ञानिक है । पान्द कवनियों के समाहार से बनना है। प्रत्येक उपरित पनि उच्चारण के अगले पग चिनुन होगाती है। ऐसी स्थिति पद के पम्तर्गन उनका समाहार कैसे होता है।

इसीसे सम्बन्धित प्रदन यह है कि प्रत्येक शब्द अगले शब्द के साथ जुड़कर समन वाक्य के स्य मे कैसे प्रत्याशील होता गयो के दूसरे दाद के उच्चारण तक प्रथम शब्द का उचजारण, फपत उसका धवण, समाप्त हो चुरा होता है । यही प्रश्न समान प्रस ग और तदुपरात समप्र कृति के सम्बन्ध में हो सकता है। वाक्पो का क्रम पूर्वापर होता है, तब ये परस्पर सावित होकर एक मन प्रसग को कैसे प्राकार देने है। इसी प्रकार पूपिरक्रम से प्रस्तुत प्रस गति की समग्रता का दोष कसे कराते हैं ? मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह गायात्मा समप्र के प्रत्यक्षीकरण को समस्या है जिसका उत्तर हमारे यहाँ स्फोटमिदान्त द्वारा दिया गया है।

डिस्क्लेमर – यह अंश मशीनी टाइपिंग है, इसमें त्रुटियाँ संभव हैं।

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